समस्तीपुर जिला मुख्यालय में सूखे नशे का बढ़ता जाल, सुलभ शौचालय बन रहे अड्डा
समस्तीपुर। जिला मुख्यालय में इन दिनों “सूखे नशे” का कारोबार तेजी से फैलता जा रहा है। नशे के रूप में उपयोग किए जाने वाले कैप्सूल, टैबलेट, कफ सिरप और इंजेक्शन खुलेआम युवाओं तक पहुंच रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन नशीले पदार्थों के सेवन के लिए शहर के कई सुलभ शौचालयों का इस्तेमाल किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि मामूली शुल्क लेकर घंटों तक शौचालय के कमरों को उपयोग के लिए उपलब्ध करा दिया जाता है, जहां युवक नशे का सेवन करते हैं।
जानकारी के अनुसार जिला मुख्यालय स्थित कई सार्वजनिक शौचालयों में दिनभर संदिग्ध युवकों की आवाजाही बनी रहती है। स्थानीय दुकानदारों और राहगीरों का कहना है कि कई युवक समूह बनाकर शौचालय में प्रवेश करते हैं और लंबे समय तक अंदर रहते हैं। बाहर निकलने के बाद उनकी हालत देखकर स्पष्ट रूप से नशे की आशंका जाहिर होती है।
अस्पताल और स्वास्थ्य समिति के आसपास खुलेआम बिक्री का आरोप
सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिला स्वास्थ्य समिति और सदर अस्पताल के आसपास स्थित कुछ मेडिकल दुकानों से बिना डॉक्टर की पर्ची के बड़ी मात्रा में नशीली दवाइयां बेची जा रही हैं। आरोप है कि एक व्यक्ति को दर्जनों कफ सिरप, नशीले कैप्सूल और इंजेक्शन आसानी से उपलब्ध करा दिए जाते हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि मेडिकल दुकानों पर न तो किसी प्रकार की सख्ती दिखाई देती है और न ही दवा बिक्री के नियमों का पालन होता है। कई दुकानों पर युवाओं की भीड़ लगी रहती है और खुलेआम नशे में उपयोग होने वाली दवाओं की खरीद-बिक्री जारी रहती है।
युवाओं का भविष्य हो रहा बर्बाद
शहर के बुद्धिजीवियों और अभिभावकों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सूखे नशे की गिरफ्त में बड़ी संख्या में किशोर और युवा आ रहे हैं। पहले जहां शराब और गांजा जैसे नशों की चर्चा होती थी, वहीं अब मेडिकल नशे का कारोबार तेजी से पैर पसार रहा है। कम कीमत और आसानी से उपलब्ध होने के कारण युवक इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं।
कई अभिभावकों ने बताया कि उनके बच्चे देर रात तक घर से बाहर रहते हैं और व्यवहार में अचानक बदलाव देखने को मिल रहा है। परिवारों का आरोप है कि प्रशासनिक उदासीनता के कारण यह समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है।
जांच के नाम पर खानापूर्ति का आरोप
लोगों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन समय-समय पर जांच अभियान चलाने का दावा तो करते हैं, लेकिन कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है। कुछ दुकानों पर छापेमारी के बाद मामला शांत हो जाता है, लेकिन अवैध बिक्री का सिलसिला फिर शुरू हो जाता है।
स्थानीय सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि जिला प्रशासन, ड्रग विभाग और पुलिस संयुक्त रूप से विशेष अभियान चलाकर मेडिकल नशे के नेटवर्क को ध्वस्त करे। साथ ही सुलभ शौचालयों की निगरानी बढ़ाने, सीसीटीवी कैमरे लगाने और संदिग्ध गतिविधियों पर कड़ी कार्रवाई करने की आवश्यकता बताई जा रही है।
समाज के लिए बनता जा रहा खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल नशे की लत युवाओं को मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बना रही है। इससे अपराध की घटनाओं में भी वृद्धि की आशंका रहती है। यदि समय रहते इस पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में यह समस्या और भयावह रूप ले सकती है।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर मुद्दे पर कितनी तत्परता दिखाते हैं, या फिर जांच और कार्रवाई केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी।



